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Al-Fath
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    1. إِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًا مُبِينًا
    बेशक हमने तुम्हारे लिये रौशन फ़त्ह फ़रमा दी
    2. لِيَغْفِرَ لَكَ اللَّهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِكَ وَمَا تَأَخَّرَ وَيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَيَهْدِيَكَ صِرَاطًا مُسْتَقِيمًا
    ताकि अल्लाह तुम्हारे कारण से गुनाह बख़्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के और अपनी नेअमतें तुम पर पूरी कर दे और तुम्हें सीधी राह दिखा दे
    3. وَيَنْصُرَكَ اللَّهُ نَصْرًا عَزِيزًا
    और अल्लाह तुम्हारी ज़बरदस्त मदद फ़रमाए
    4. هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ السَّكِينَةَ فِي قُلُوبِ الْمُؤْمِنِينَ لِيَزْدَادُوا إِيمَانًا مَعَ إِيمَانِهِمْ وَلِلَّهِ جُنُودُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا
    वही है जिसने ईमान वालों के दिलों में इत्मीनान उतारा ताकि उन्हें यक़ीन पर यक़ीन बढ़े और अल्लाह ही की मिल्क (स्वामित्व में) हैं तमाम लश्कर आसमानों और ज़मीन के और अल्लाह इल्म व हिकमत (बोध) वाला है
    5. لِيُدْخِلَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَيُكَفِّرَ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَكَانَ ذَلِكَ عِنْدَ اللَّهِ فَوْزًا عَظِيمًا
    ताकि ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों को बाग़ों में ले जाए जिनके नीचे नेहरें बहे हमेशा उनमें रहें और उनकी बुराइयाँ उनसे उतार दे, और यह अल्लाह के यहाँ बड़ी कामयाबी है
    6. وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِقِينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْمُشْرِكِينَ وَالْمُشْرِكَاتِ الظَّانِّينَ بِاللَّهِ ظَنَّ السَّوْءِ عَلَيْهِمْ دَائِرَةُ السَّوْءِ وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَلَعَنَهُمْ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَهَنَّمَ وَسَاءَتْ مَصِيرًا
    और अज़ाब दे मुनाफ़िक़ (दोग़ले) मर्दों और मुनाफ़िक़ औरतों और मुश्रिक मर्दों और मुश्रिक औरतों को जो अल्लाह पर गुमान रखते हैं उन्हीं पर है बड़ी गर्दिश (मुसीबत) और अल्लाह ने उन पर ग़ज़ब फ़रमाया और उन्हें लअनत की और उनके लिये जहन्नम तैयार फ़रमाया, और वह क्या ही बुरा अंजाम
    7. وَلِلَّهِ جُنُودُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
    और अल्लाह ही की मिल्क में आसमानों और ज़मीन के सब लश्कर, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाला है
    8. إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِيرًا
    बेशक हमने तुम्हें भेजा हाज़िर व नाज़िर (सर्व दृष्टा) और ख़ुशी और डर सुनाता
    9. لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَأَصِيلًا
    ताकि ऐ लोगों तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और रसूल की तअज़ीम व तौक़ीर (आदर व सत्कार) करो, और सुबह शाम अल्लाह की पाकी (प्रशंसा) बोलो
    10. إِنَّ الَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ اللَّهَ يَدُ اللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ فَمَنْ نَكَثَ فَإِنَّمَا يَنْكُثُ عَلَى نَفْسِهِ وَمَنْ أَوْفَى بِمَا عَاهَدَ عَلَيْهُ اللَّهَ فَسَيُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا
    वो जो तुम्हारी बैअत करते (अपना हाथ तुम्हारे हाथ में देते) हैं वो तो अल्लाह ही से बैअत करते हैं उनके हाथों पर अल्लाह का हाथ है, तो जिसने एहद तोड़ा उसने अपने बड़े एहद को तोड़ा, और जिसने पूरा किया वह एहद जो उसने अल्लाह से किया था तो बहुत जल्द अल्लाह उसे बड़ा सवाब देगा
    11. سَيَقُولُ لَكَ الْمُخَلَّفُونَ مِنَ الْأَعْرَابِ شَغَلَتْنَا أَمْوَالُنَا وَأَهْلُونَا فَاسْتَغْفِرْ لَنَا يَقُولُونَ بِأَلْسِنَتِهِمْ مَا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ قُلْ فَمَنْ يَمْلِكُ لَكُمْ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ بِكُمْ ضَرًّا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ نَفْعًا بَلْ كَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
    अब तुम से कहेंगे जो गंवार पीछे रह गए थे कि हमें हमारे माल और हमारे घर वालों ने जाने से मश्ग़ूल रखा अब हुज़ूर हमारी मग़फ़िरत चाहें अपनी ज़बानों से वो बात कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं तुम फ़रमाओ तो अल्लाह के सामने किसे तुम्हारा कुछ इख़्तियार है अगर वह तुम्हारा बुरा चाहे या तुम्हारी भलाई का इरादा फ़रमाए बल्कि अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है
    12. بَلْ ظَنَنْتُمْ أَنْ لَنْ يَنْقَلِبَ الرَّسُولُ وَالْمُؤْمِنُونَ إِلَى أَهْلِيهِمْ أَبَدًا وَزُيِّنَ ذَلِكَ فِي قُلُوبِكُمْ وَظَنَنْتُمْ ظَنَّ السَّوْءِ وَكُنْتُمْ قَوْمًا بُورًا
    बल्कि तुम तो ये समझे हुए थे कि रसूल और मुसलमान हरगिज़ घरों को वापस न आएंगे और उसी को अपने दिलों में भला समझे हुए थे और तुमने बुरा गुमान किया और तुम हलाक होने वाले लोग थे
    13. وَمَنْ لَمْ يُؤْمِنْ بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ فَإِنَّا أَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ سَعِيرًا
    और जो ईमान न लाए अल्लाह और उसके रसूल पर तो बेशक हमने काफ़िरों के लिये भड़कती आग तैयार कर रखी है
    14. وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَغْفِرُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَاءُ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا
    और अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत जिसे चाहे बख़्शे और जिसे चाहे अज़ाब करे और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है
    15. سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ إِذَا انْطَلَقْتُمْ إِلَى مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ يُرِيدُونَ أَنْ يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللَّهِ قُلْ لَنْ تَتَّبِعُونَا كَذَلِكُمْ قَالَ اللَّهُ مِنْ قَبْلُ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًا
    अब कहेंगे पीछे बैठ रहने वाले जब तुम ग़नीमतें लेने चलो तो हमें भी अपने पीछे आने दो वो चाहते हैं अल्लाह का कलाम बदल दें तुम फ़रमाओ हरगिज़ तुम हमारे साथ न आओ अल्लाह ने पहले से यूंही फ़रमा दिया है तो अब कहेंगे बल्कि तुम हमसे जलते हो बल्कि वो बात न समझते थे मगर थोड़ी
    16. قُلْ لِلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَى قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ فَإِنْ تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا وَإِنْ تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُمْ مِنْ قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
    उन पीछे रह गए हुए गंवारों से फ़रमाओ बहुत जल्द तुम एक सख़्त लड़ाई वाली क़ौम की तरफ़ बुलाए जाओगे कि उनसे लड़ो या वो मुसलमान हो जाएं, फिर अगर तुम फ़रमान मानोगे अल्लाह तुम्हें अच्छा सवाब देगा और अगर फिर जाओगे जैसे पहले फिर गए तो तुम्हें दर्दनाक अज़ाब देगा
    17. لَيْسَ عَلَى الْأَعْمَى حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ وَمَنْ يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا
    अंधे पर तंगी नहीं और न लंगड़े पर मुज़ायक़ा और न बीमार पर मुआख़िज़ा और जो अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म माने अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नहरें बहें, और जो फिर जाएगा उसे दर्दनाक अज़ाब फ़रमाएगा
    18. لَقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنْزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
    बेशक अल्लाह राज़ी हुआ ईमान वालों से जब वो उस पेड़ के नीचे तुम्हारी बैअत करते थे तो अल्लाह ने जाना जो उनके दिलों में है तो उनपर इत्मीनान उतारा और उन्हें ज़ल्द आने वाली फ़त्ह का इनाम दिया
    19. وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
    और बहुत सी ग़नीमतें जिन को लें, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत वाला है
    20. وَعَدَكُمُ اللَّهُ مَغَانِمَ كَثِيرَةً تَأْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هَذِهِ وَكَفَّ أَيْدِيَ النَّاسِ عَنْكُمْ وَلِتَكُونَ آيَةً لِلْمُؤْمِنِينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَاطًا مُسْتَقِيمًا
    और अल्लाह ने तुम से वादा किया है बहुत सी ग़नीमतों का कि तुम लोगे तो तुम्हें वह ज़ल्द अता फ़रमा दी और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिये और इसलिये कि ईमान वालों के लिये निशानी हो और तुम्हें सीधी राह दिखा दे
    21. وَأُخْرَى لَمْ تَقْدِرُوا عَلَيْهَا قَدْ أَحَاطَ اللَّهُ بِهَا وَكَانَ اللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرًا
    और एक और जो तुम्हारे बल की न थी वह अल्लाह के क़ब्ज़े में है, और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
    22. وَلَوْ قَاتَلَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
    और अगर काफ़िर तुम से लड़ें तो ज़रूर तुम्हारे मुक़ाबले से पीठ फेर देंगे फिर कोई हिमायती न पाएंगे न मददगार
    23. سُنَّةَ اللَّهِ الَّتِي قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلُ وَلَنْ تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا
    अल्लाह का दस्तूर है कि पहले से चला आता है और हरगिज़ तुम अल्लाह का दस्तूर बदलता न पाओगे
    24. وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنْكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُمْ بِبَطْنِ مَكَّةَ مِنْ بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
    और वही है जिसने उनके हाथ तुम से रोक दिये और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिये मक्का की घाटी में बाद इसके कि तुम्हें उनपर क़ाबू दे दिया था और अल्लाह तुम्हारे काम देखता है
    25. هُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَالْهَدْيَ مَعْكُوفًا أَنْ يَبْلُغَ مَحِلَّهُ وَلَوْلَا رِجَالٌ مُؤْمِنُونَ وَنِسَاءٌ مُؤْمِنَاتٌ لَمْ تَعْلَمُوهُمْ أَنْ تَطَئُوهُمْ فَتُصِيبَكُمْ مِنْهُمْ مَعَرَّةٌ بِغَيْرِ عِلْمٍ لِيُدْخِلَ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ مَنْ يَشَاءُ لَوْ تَزَيَّلُوا لَعَذَّبْنَا الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
    वो वो हैं जिन्होंने कुफ़्र किया और तुम्हें मस्जिदें हराम से रोका और क़ुरबानी के जानवर रूके पड़े अपनी जगह पहुंचने से और अगर यह न होता कुछ मुसलमान मर्द और कुछ मुसलमान औरतें जिनकी तुम्हें ख़बर नहीं कहीं तुम उन्हें रौंदे डालो तो तुम्हें उनकी तरफ़ से अनजानी में कोई मकरूह पहुंचे तो हम तुम्हें उनके क़िताल की इजाज़त देते उनका यह बचाव इसलिये है कि अल्लाह अपनी रहमत में दाख़िल करें जिसे चाहे, अगर वो जुदा हो जाते तो हम ज़रूर उनमें के काफ़िरों को दर्दनाक अज़ाब देते
    26. إِذْ جَعَلَ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الْجَاهِلِيَّةِ فَأَنْزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَى رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوَى وَكَانُوا أَحَقَّ بِهَا وَأَهْلَهَا وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
    जब कि काफ़िरों ने अपने दिलों में आड़ रखी है वही अज्ञानता के ज़माने की आड़ तो अल्लाह ने अपना इत्मीनान अपने रसूल और ईमान वालों पर उतारा और परहेज़गारी का कलिमा उनपर अनिवार्य फ़रमाया और वो उसके ज़्यादा सज़ावार और उसके योग्य थे और अल्लाह सब कुछ जानता है
    27. لَقَدْ صَدَقَ اللَّهُ رَسُولَهُ الرُّؤْيَا بِالْحَقِّ لَتَدْخُلُنَّ الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ إِنْ شَاءَ اللَّهُ آمِنِينَ مُحَلِّقِينَ رُءُوسَكُمْ وَمُقَصِّرِينَ لَا تَخَافُونَ فَعَلِمَ مَا لَمْ تَعْلَمُوا فَجَعَلَ مِنْ دُونِ ذَلِكَ فَتْحًا قَرِيبًا
    बेशक अल्लाह ने सच कर दिया अपने रसूल का सच्चा ख़्वाब बेशक तुम ज़रूर मस्जिदे हराम में दाख़िल होंगे अगर अल्लाह चाहे अम्नो अमान से अपने सरों के बाल मुंडाते या तरशवाते बेख़ौफ़, तो उसने जाना जो तुम्हे मालूम नहीं तो उससे पहले एक नज़्दीक़ आने वाली फ़त्ह रखी
    28. هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَكَفَى بِاللَّهِ شَهِيدًا
    वही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा कि उसे सब दीनों पर ग़ालिब करे और अल्लाह काफ़ी है गवाह
    29. مُحَمَّدٌ رَسُولُ اللَّهِ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ تَرَاهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا سِيمَاهُمْ فِي وُجُوهِهِمْ مِنْ أَثَرِ السُّجُودِ ذَلِكَ مَثَلُهُمْ فِي التَّوْرَاةِ وَمَثَلُهُمْ فِي الْإِنْجِيلِ كَزَرْعٍ أَخْرَجَ شَطْأَهُ فَآزَرَهُ فَاسْتَغْلَظَ فَاسْتَوَى عَلَى سُوقِهِ يُعْجِبُ الزُّرَّاعَ لِيَغِيظَ بِهِمُ الْكُفَّارَ وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُمْ مَغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا
    मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और उनके साथ वाले काफ़िरों पर सख़्त हैं और आपस में नर्म दिल उन्हें देखेगा रूकू करते सज्दे में गिरते अल्लाह का फ़ज़्ल और रज़ा चाहते, उनकी निशानी उनके चेहरों में है सज्दों के निशान से यह उनकी सिफ़त (विशेषता) तौरात में है और उनकी सिफ़त इंजील में हैं जैसे एक खेती उसने अपना पट्ठा निकाला फिर उसे ताक़त दी फिर दबीज़ (मोटी) हुई फिर अपनी पिंडली पर सीधी खड़ी हुई किसानों को भली लगती है ताकि उनसे काफ़िरों के दिल जलें, अल्लाह ने वादा किया उनसे जो उनमें ईमान और अच्छे कामों वाले हैं बख़्शिश और बड़े सवाब का

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