उम्मीद में अपना कुछ नहीं है, कोई आमाल नहीं, कोई घमंड नहीं, जो है उसी का है, बख्‍श दे तो उसकी बख्शिश, रहम कर दे तो उसकी रहमत।

हुज़ूरﷺ फ़रमाते हैं कि ख़ुदा फ़रमाता है. मैं वैसा ही हूं, जैसा मेरा बंदा मेरे बारे में सोचता है। जब भी वो मुझे याद करता है, मैं उसके पास होता हूं। अगर वो मुझे दिल ही दिल में याद करता है तो मैं भी उसे दिल ही दिल में याद करता हूं। अगर वो लोगों में मेरा जि़क्र करता है तो मैं उससे बेहतर लोगों में उसका जि़क्र करता हूं। अगर वो एक बालिश मेरी तरफ़ आता है तो मैं एक हाथ उसकी तरफ़ आता हूं। वो एक हाथ मेरी तरफ़ बढ़ता है तो मैं दो हाथ उसकी तरफ़ बढ़ता हूं। अगर वो पैदल मेरी तरफ़ आता है तो मैं दौड़कर उसकी तरफ़ आता हूं।