इश्क़ की ख़ुशबू है सूफ़ी ishq ki khushbu hai sufi

इश्क़ की ख़ुशबू है सूफ़ी 

सूफ़ियों का जिक़्र होता है, तो सफ़ेद चोगे में, हाथ फैलाए घूमते लोगों का चित्र उभर आता है। लेकिन सूफ़ियों का सिर्फ़ यही परिचय नहीं। सूफ़ी का अर्थ जितना विस्तृत है, उतना ही रहस्यमय भी। संतों के इन जीवन-प्रसंगों से जानिए सूफ़ीवाद की शिक्षाएं क्या कहती हैं..

एक विख्यात सूफ़ी संत थे। उनका नाम था अबुल हसन। वे बहुत पहुंचे हुए इंसान थे। एक दिन एक भक्त उनके पास आया। बोला, ‘मैं सत्संग और उपासना करते-करते थक गया हूं, लेकिन मुझे कोई लाभ नहीं होता। हैरान हूं। क्या करूं?’ अबुल हसन ने पूछा, ‘क्या बात है?’ उसने कहा, ‘मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है। चाहता हूं, वह दूर हो। मारे लालच के मेरा बुरा हाल है। दुनिया की मोह-माया मुझे सताती है। मैं बहुत दुखी हूं। आप ही मुझे कोई रास्ता बताइए।’

अबुल हसन ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी। फिर कहा, ‘जिंदगी की एक बहुत बड़ी सच्चई है, उसे याद रख।’ आदमी ने जिज्ञासा से पूछा, ‘वह सच्चई क्या है?’ अबुल हसन ने जवाब दिया, ‘गंदे बर्तन में कोई चीज डालो, तो वह कैसी हो जाती है?’ ‘गंदी।’ आदमी ने तत्काल जवाब दिया। हसन बोले, ‘याद रख, बर्तन तेरा दिल है। जब तक वह साफ़ नहीं होगा, तब तक तू जो उसमें डालेगा, वह भी गंदा हो जाएगा। सत्संग और उपासना का फ़ायदा तभी पहुंचता है, जब दिल साफ़ होता है। मन में तरह-तरह की वासनाएं और दूसरे विकार भरे होते हैं, उन्हें त्याग करके ही इंसान कुछ पा सकता है।’
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सूफ़ी संतों में अबु मुहम्मद जाफ़र सादिक़ एक बड़े संत हुए हैं। एक दिन उन्होंने एक आदमी से पूछा, ‘अक्लमंद की पहचान क्या है?’ उसने कहा, ‘जो नेकी और बदी में तमीज कर सके।’ संत सादिक़ बोले, ‘यह काम तो जानवर भी कर सकते हैं और करते हैं। जो उनकी परवाह करते हैं, उन्हें वे नहीं काटते और जो उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं, उन्हें वे काटते हैं।’ उस आदमी
ने कहा, ‘तब आप ही बताइए कि अक्लमंद कौन है?’

संत ने उत्तर दिया, ‘अक्लमंद वह है, जो दो अच्छी बातों में जान सके कि ज्यादा अच्छी बात कौन-सी है और दो बुरी बातों में यह पहचान कर सके कि ज्यादा बुरी कौन-सी है। यह पहचान करके जो ज्यादा अच्छी बात हो, उसे करे और अगर बुरी बात करने की लाचारी पैदा हो जाए, तो जो कम बुरी है, उसे करे और बड़ी बुराई से बचे।’
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कश्मीर की प्रसिद्ध सूफ़ी संत ललद्यद या लल्ला देद एक बार एक दुकानदार के पास गईं। कपड़े की दुकान थी। लल्ला ने उससे कपड़ा मांगा। उसके समान भाग कर दो टुकड़े बनाए। एक टुकड़ा उन्होंने अपने एक कंधे पर तथा दूसरा दूसरे कंधे पर रखा। फिर वे बाजार में घूमने लगीं। रास्ते में उन्हें कोई गाली देता, कोई नमस्कार करता। जैसे ही कोई गाली देता, वे दाएं कंधे के कपड़े पर एक गांठ लगा लेतीं और किसी के नमस्कार करते व़क्त बाएं कंधे के कपड़े पर एक गांठ लगा लेतीं।

शाम को जब वे दुकानदार के पास पहुंचीं, तो उन्होंने दोनों कंधों पर रखे टुकड़ों को अलग-अलग तौलने के लिए कहा। दुकानदार ने उन्हें तौला, तो दोनों समान वजन के निकले, बराबर थे। तब लल्ला ने उसे समझाया, ‘देख, आज मुझे जितनी गालियां मिली हैं, उतना ही सम्मान मिला है। तो क्या फ़िक़्र करनी! कोई पत्थर फेंके या फूल, हिसाब बराबर है। अत: दोनों स्थितियों में समान रहना है, चाहे निंदा हो या स्तुति।’ इसीलिए कश्मीरी लोग कहते थे, हम दो ही नाम जानते हैं, एक अल्लाह, दूसरा लल्ला।