मुहम्मदﷺ  साहब ने दूसरे धर्मों के लोगों को भी आमंत्रित किया, क्योंकि वो कोई नया धर्म नहीं बना रहे थे। वो तो सभी को एक ही आस्था में शामिल होने के लिए आवाज़ दे रहे थे। वो धार्मिक दूरियों को तोड़ना चाहते थे। अगर ऐसा हो गया होता तो आज नफ़रत की जगह सिर्फ मुहब्बत होती।

(नेपोलियन हील, थींक ग्रो एण्ड रिच)

 

व्यवहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत, चाहे कितने ही उत्तम व अद्भूत हों, विशाल मानव जाति के लिए मूल्यहीन हैं।

(टीचिंग ऑफ विवेकानंद 214-218, अद्वैत आश्रम, कोलकाता 2004)

 

‘‘…मुहम्मदﷺ  की शिक्षा, सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक शिक्षा है, जो कि अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करती है। ये कोई तलवार नहीं है, बल्कि सच्चाई व समानता की वो ताकत है, जो अपनी बाहों में आने को विवश करता है…।’’

(डॉ. भीमराव अम्बेडकर, ‘दस स्पोक अम्बेडकर’ चौथा खंड-भगवानदास 144-145)

 

किसी समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़, पहले कभी नहीं दिया गया, जितना मुहम्मदﷺ  ने दिया।

(मुंशी प्रेमचंद)

 

 

दरूद सलाम

सारे आमाले हस्ना और अज़कारे तय्यबा में यही एक मुक़द्दस अमल है, जिसकी निसबत अल्लाह ने ख़ुद अपनी तरफ़ फ़रमाई है .

बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते दरूद भेजते हैं, उस ग़ैब बताने वाले (हज़रत मुहम्मदﷺ ) पर। ऐ ईमानवालों! (तुम भी) उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।

(कुरान 33:56)

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं कि जिसके सामने मेरा ज़िक्र हो उसे, मुझ पर दरूद भेजना वाजिब है और जिसने मुझ पर एक मरतबा दरूद भेजा, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है। (तरगीब 2.494, रवाहुन निसाई.1409)

हज़रत मुहम्मदﷺ  पर, ज़िन्दगी में कम से कम एक बार दरूद पढ़ना फ़ज़्र है और जिस मजलीस में आपﷺ  का ज़िक्र हो रहा है, वहां एक बार दरूद पढ़ना वाजिब है।

दिखावे के लिए दरूद पढ़ना

नमाज़ अगर दिखावे के लिए पढ़ी जाए तो उसे आपके मुंह पर मार दी जाएगी और सवाब के बजाए अज़ाब मिलेगा, लेकिन दरूद पाक वो अज़ीम अमल है, जो हर सूरत में बारगाहे ख़ुदावंदी में मक़बूल है। चाहे वो दिखावे के लिए ही क्यूं न हो।

दरूद सलाम क्यों पढ़ें?

हुज़ूरﷺ  पर सलातो सलाम का नज़राना पेश करना एक तरह से बुलन्द दरजात की दुआ है। अब यहां ये सवाल उठता है कि क्या हुज़ूरﷺ  हमारी दुआ के मोहताज हैं? क्या हमारे दुआ करने से उनके दरजात बुलन्द होते हैं, नहीं बिल्कुल नहीं। उनके दरजात बुलन्द करने की हमारी क्या औकात। जिनका नूर, सबसे पहले पैदा किया गया, जो तमाम अम्बिया के सरदार हैं, जिन पर ख़ुद रब्बुल आलमीन दरूद भेजता है। उन्हें हमारी दुआ की क्या ज़रूरत। हमारी दुआ के बगैर भी उनका दरजा अल्लाह के बाद सबसे ऊपर है।

तो फिर हम दरूदो सलाम क्यों पढ़ते हैं?

इसके जवाब में हज़रत इश्तियाक़ आलम शहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं कि हुज़ूरﷺ  पर दरूदो सलाम भेजने के दो मक़सद हैं.

  1. ज़िक्र ब़ुलन्द करना

अल्लाह ने क़ुरान में फ़रमाया.

‘‘और हमने आप की खातिर, आपका ज़िक्र (अपने ज़िक्र के साथ मिलाकर दुनिया व आखि़रत में हर जगह) बुलन्द फ़रमा दिया’’

(कुरान 94:4)

अल्लाह ने हुज़ूरﷺ  का ज़िक्र हमेशा के लिए सबसे बुलन्द कर दिया है और हम वो ज़िक्र करके अल्लाह के उस फ़रमान के शाहिद व गवाह हो रहे हैं।

 

  1. शुक्र अदा करना

‘‘बेशक अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा एहसान फ़रमाया कि उनमें उन्हीं में से (बड़ी अज़मत वाले) रसूल भेजा, जो उन पर उसकी आयतें पढ़ते और उन्हें पाक करते है और उन्हें किताब व हिकमत की तालीम देते हैं,…’’

(कुरान 3:164)

हुज़ूरﷺ  के इतने एहसानात तो हम पर हैं ही, इस आयत के मुताबिक उनकी विलादत भी हम पर एहसान है। जब कोई एहसानमंद, एहसान का सिला नहीं दे पाता तो एहसान करने वाले के हक़ में दुआ व शुक्र अदा करता है। हुज़ूरﷺ  का हम पर बेहिसाब एहसानात हैं और दरूदो सलाम उसका छोटा सा शुकराना है। हम उनके एहसानों का सिला तो नहीं दे सकते लेकिन उनका शुक्र तो अदा कर सकते हैं।

‘‘अल्लाहुम्मासल्ले अला मुहम्मदिन’’

ऐ अल्लाह, तू ही हमारी तरफ़ से अपने महबूब पर दरूद भेज दे।